
मुंगेली/ शहर का सबसे बड़ा सार्वजनिक गार्डन इस वक्त विकास नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का प्रतीक बन चुका है। करोड़ों की लागत से तैयार हुआ गार्डन हफ्तों से ताले में जकड़ा पड़ा है और आम जनता को उसके ही हक से वंचित किया जा रहा है। वजह सिर्फ एक—“उद्घाटन की राजनीति”। यानी जब तक कोई बड़ा नेता फीता नहीं काटेगा, तब तक बच्चों की हंसी और बुजुर्गों की राहत इस गार्डन में कैद रहेगी।
पूरी तरह तैयार… फिर भी बंद – आखिर किसका इंतजार?
सूत्रों के मुताबिक गार्डन का उन्नयन कार्य कई हफ्ते पहले ही पूरा हो चुका है। ठेकेदार नगर पालिका को हैंडओवर कर चुका है। आधुनिक लाइटिंग, आकर्षक झूले, बच्चों के लिए मिनी ट्रेन, बैठने की सुंदर व्यवस्था—हर सुविधा तैयार है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सब कुछ तैयार है, तो गार्डन पर ताला क्यों?
जवाब साफ है—प्रशासन किसी मंत्री या बड़े नेता के “वीआईपी उद्घाटन” का इंतजार कर रहा है। यानी जनता का हक नेताओं की तारीख का मोहताज बना दिया गया है।
जनता पसीने में तर, सिस्टम एसी में मस्त
भीषण गर्मी और उमस के बीच जब लोग शाम को थोड़ी राहत के लिए गार्डन पहुंचते हैं, तो उन्हें बंद गेट देखकर मायूसी हाथ लगती है।
बच्चे बाहर खड़े होकर झूलों को देखते रह जाते हैं—अंदर जाने की इजाजत नहीं।
बुजुर्ग, जिन्हें सुरक्षित और शांत माहौल में टहलना चाहिए, अब सड़कों पर जान जोखिम में डालकर चलने को मजबूर हैं।
महिलाएं भी इस बंद गार्डन को देखकर आक्रोशित हैं—उनके लिए यह सिर्फ एक पार्क नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से राहत का जरिया था, जिसे सिस्टम ने छीन लिया है।
“जनता के पैसे पर ताला”—किसकी जिम्मेदारी?
यह गार्डन किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसों से बना है। फिर सवाल उठता है—क्या जनता को इसका इस्तेमाल करने के लिए भी किसी वीआईपी की इजाजत चाहिए?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सीधे-सीधे जनता के अधिकारों का हनन है। अगर उद्घाटन में देरी हो रही है, तो क्या गार्डन को अस्थायी रूप से खोलना इतना मुश्किल है?
या फिर प्रशासन यह दिखाना चाहता है कि बिना फोटो-ऑप और फीता काटे कोई काम “पूरा” नहीं माना जाएगा?
उद्घाटन नहीं, “राजनीतिक इवेंट” बन गया गार्डन
नगर पालिका और प्रशासन की यह कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में है। विकास कार्यों को जनता की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नेताओं की ब्रांडिंग के लिए रोका जा रहा है।
गार्डन, जो बच्चों की हंसी और परिवारों की खुशियों का केंद्र होना चाहिए था, आज सिर्फ एक “शो-पीस” बनकर रह गया है—ताकि किसी दिन कैमरों के सामने फीता कटे और तालियां बजे।
जनता का गुस्सा उबाल पर – अब चुप नहीं बैठेगी
स्थानीय नागरिकों में गुस्सा लगातार बढ़ रहा है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि अगर जल्द गार्डन नहीं खोला गया, तो वे सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।
“हमें उद्घाटन नहीं, इस्तेमाल चाहिए”—यह आवाज अब हर गली-मोहल्ले में गूंजने लगी है।
सीधा सवाल प्रशासन से…
क्या जनता की सुविधा से ज्यादा जरूरी नेताओं का शो-ऑफ है?
क्या गार्डन खोलने के लिए भी “वीआईपी अनुमति” जरूरी है?
आखिर कब तक आम लोग अपने ही हक के लिए इंतजार करते रहेंगे?
अंतिम चेतावनी…
अगर जल्द ताले नहीं खुले, तो यह मुद्दा सिर्फ खबर नहीं रहेगा—जन आंदोलन बन जाएगा।
प्रशासन को समझना होगा—यह सवाल सिर्फ एक गार्डन का नहीं, बल्कि जनता के अधिकार और सम्मान का है।


👉 “ताला नहीं खुला, तो जवाब देना होगा!”

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