मुंगेली। जिस स्कूल से संस्कार, अनुशासन और जिम्मेदार नागरिक बनने की उम्मीद की जाती है, वहीं अगर खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जाएं, तो क्या कहेंगे आप ? यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। मुंगेली के पीएम श्री स्वामी आत्मानंद स्कूल में आयोजित फेयरवेल कार्यक्रम के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने पूरे शिक्षा तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
जानकारी के मुताबिक, फेयरवेल के दिन काली लग्जरी गाड़ियों का पहले बी.आर. साव मैदान में जमावड़ा कराया गया और फिर इन्हें रैली की शक्ल में स्कूल परिसर तक दौड़ाया गया। इस दौरान न तो यातायात नियमों का पालन किया गया और न ही किसी प्रकार की वैधानिक अनुमति या प्रशासनिक निगरानी नजर आई। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इस पूरी अराजकता में स्कूली छात्र शामिल थे, जिन्हें कानून का पालन सिखाने की बजाय कानून तोड़ने का “प्रैक्टिकल ट्रेनिंग” दे दी गई।
स्थानीय नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका कहना है कि इस तरह की गतिविधियां सड़क सुरक्षा के लिए टाइम बम साबित हो सकती थीं। सवाल यह नहीं है कि हादसा हुआ या नहीं, सवाल यह है कि हादसे का इंतज़ार क्यों किया गया? क्या स्कूल प्रशासन किसी बड़े अनहोनी के बाद ही जागता?
सबसे बड़ा और चुभता सवाल यह है कि क्या स्कूल प्रबंधन पूरी तरह अंजान था, या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं? यदि जानकारी नहीं थी, तो यह घोर अक्षमता है, और यदि जानकारी थी, तो यह सीधी मिलीभगत मानी जानी चाहिए।
नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि फेयरवेल जैसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का उद्देश्य अनुशासन और गरिमा होना चाहिए था, लेकिन यहां इसे शक्ति प्रदर्शन, दिखावे और नियम-विहीनता के मंच में बदल दिया गया। स्कूल प्रशासन की चुप्पी इस पूरे मामले को और भी संदेहास्पद बना रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में केवल औपचारिकता निभाएगा, या फिर जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई कर एक मिसाल पेश करेगा? यदि इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, तो यह साफ संदेश होगा कि शिक्षा संस्थानों को कानून से ऊपर मान लिया गया है।

👉 यह घटना न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के लिए खतरनाक उदाहरण भी है।
👉 दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो यह चुप्पी भी अपराध मानी जाएगी।

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