मुंगेली (लोरमी)|प्रशासनिक गलियारों में जब साजिशें बुनी जाती हैं, तो अक्सर झूठ का सहारा लिया जाता है। लेकिन लोरमी तहसील के ताजा घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। तहसीलदार और पटवारियों के बीच चल रहे गतिरोध की आड़ में रची गई ‘वीडियो कॉल कांड’ की झूठी कहानी आज कलेक्टर जनदर्शन में पूरी तरह जमींदोज हो गई।
षड्यंत्र का खुलासा
यह मामला केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं था, बल्कि एक अधिकारी की सामाजिक प्रतिष्ठा को पूरी तरह नष्ट करने का सुनियोजित प्रयास (Premeditated Attempt) था। एक पत्रकार की मनगढ़ंत रिपोर्ट को हथियार बनाकर समाजसेवी कोमल सिंह राजपूत ने 3 फरवरी को तहसीलदार के विरुद्ध ‘चरित्र हनन’ की मोर्चाबंदी की थी। आरोप था कि तहसीलदार महिला पटवारियों को वीडियो कॉल कर अभद्रता करते हैं।
कानूनी प्रहार: बैकफुट पर आए समाज सेवी
जब तहसीलदार ने माननीय हाईकोर्ट के अधिवक्ता श्री निखिल शुक्ला के माध्यम से कठोर विधिक कार्रवाई (Strict Legal Action) का मन बनाया, तब आरोपों की नींव हिल गई। मानहानि के नोटिस ने यह स्पष्ट कर दिया कि सोशल मीडिया पर फैलाई गई हर झूठ का हिसाब कोर्ट में देना होगा।
सत्य की स्वीकारोक्ति
विधिक परिणामों से भयभीत कोमल सिंह राजपूत ने आज 10 फरवरी को कलेक्टर जनदर्शन में उस समय सबको चौंका दिया, जब उन्होंने अपनी पिछली शिकायत को ‘तथ्यहीन’ बताते हुए वापस ले लिया।
- माफी का स्वरूप: उन्होंने न केवल लिखित माफीनामा दिया, बल्कि उपस्थित जनसमूह के सामने हाथ जोड़कर अपनी गलती मानी।
- अस्वीकरण: उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास इन आरोपों का कोई डिजिटल साक्ष्य या चश्मदीद गवाह नहीं था।
यह घटना उन सभी के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सोशल मीडिया और झूठी शिकायतों के जरिए किसी लोक सेवक को ‘ब्लैकमेल’ या ‘दबाने’ का प्रयास करते हैं। लोरमी तहसीलदार ने विधिक रास्ता अपनाकर न केवल अपनी साख बचाई, बल्कि उन षड्यंत्रकारियों को भी बेनकाब किया जो पटवारी हड़ताल की आड़ में अपना निजी स्वार्थ साध रहे थे।

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